दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ पर लगा ट्रैफिक जाम

नई दिल्ली:‘एवरेस्ट फतह करने गए पर्वतारोहियों के साथ होने वाले हादसों की खबरें आना अब आम हो गया है। आंखों में सपने और दिल में जोश भरे जब पर्वतारोही अपनी यात्रा के लिए निकलते हैं तो उन्हें शायद इस बात का वास्तविक अंदाजा नहीं होता कि रास्तों पर बिछी बर्फ कोई मखमली नहीं बल्कि पथरीला अहसास कराएगी।

एरिजोना, अमेरिका की डॉक्टर एड डोहरिंग के जीवन का सपना था माउंट एवरेस्ट फतह करना। पिछले हफ्ते उनका यह सपना पूरा हो भी गया लेकिन उन्होंने दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ की चोटी पर जो देखा वह किसी भयानक सपने से कम नहीं था।
चोटी के नजदीक पर्वतारोही सेल्फी लेने के लिए धक्कामुक्की कर रहे थे। चोटी पर करीब १८ गुणे १० फुट आकार की सपाट सतह है जिस पर पंद्रह – बीस लोग भरे पड़े थे। तिल रखने की जगह खाली नहीं बची थी। इस सपाट सतह पर पहुंचने के लिए दर्जनों लोग कतार में नीचे खड़े थे। कतार में पैक्ड लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ रहा था। एक तरह बर्फ की दीवार थी तो दूसरी तरह हजारों फुट गहरी खाई। डॉक्टर डोहरिंग बताते हैं कि उन्हें आगे बढऩे के लिए एक महिला पर्वतारोही के शव को लांघना पड़ा जिसकी कुछ क्षण पहले मौत हो गई थी।

माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने के लिए हर साल का सर्वोत्तम सीजन मई महीने का होता है लेकिन इस साल इस सीजन में अब तक कम से कम एक दर्जन मौतें हो चुकीं हैं। एवरेस्ट पर आमतौर पर खराब मौसम, बर्फ के तूफान व तेज हवाओं के कारण हादसे होते हैं लेकिन इस बार हादसों की वजह जरूरत से ज्यादा भीड़ और नौसुखिया व अप्रशिक्षित लोगों द्वारा एवरेस्ट पर चढऩे की कोशिश करना है। तमाम एडवेंचर कंपनियां अप्रशिक्षित पर्वतारोहियों को एवरेस्ट पर चढ़ा रही हैं जिससे वे खुद और अन्य लोग जोखिम में पड़ रहे हैं। नेपाली सरकार भी ज्यादा से ज्यादा कमाई करने के फेर में एवरेस्ट पर चढऩे के परमिट बांटे जा रही है। सरकार एक परमिट के ११ हजार अमेरिकी डालर लेती है और इस साल रिकार्ड ३८१ परमिट जारी किए गए हैं। नतीजतन एवरेस्ट पर ट्रैफिक जाम की स्थिति बनी है। इतनी उंचाई पर जरा भी चूक की गुंजाइश नहीं होती। चोटी पर पहुंचने के लिए पर्वतारोही बहुत ही कम सामान ले कर चढ़ सकते हैं। चंद ऑक्सीजन सिलेंडर ही साथ जा पाते हैं। इस ‘डेथ जोन’ में दिमाग भी ठीक से काम नहीं करता और एक-दो घंटे की देरी भी जानलेवा साबित हो सकती है। शेरपाओं और पर्वतारोहियों के अनुसार इस साल एवरेस्ट पर मौतों का एक कारण आखिरी एक हजार फुट में लंबी कतारें लगना है। इसी कतार में तमाम ऐसे लोग होते हैं जिन्हें पर्वतारोहण के बेसिक नियम भी नहीं आते और वे शेरपाओं पर पूरी तरह निर्भर होते हैं। इसके अलावा चंद दिनों का अच्छा मौसम भी एक फैक्टर है। मई का महीना सर्वोत्तम समय रहता है लेकिन इस महीने में भी चंद दिन साफ मौसम वाले होते हैं। चूंकि पहाड़ पर कोई सरकारी दिशा निर्देश होते नहीं सो सब कुछ पर्वतारोही कंपनियों के हवाले हो जाता है।

भ्रष्टाचार का बोलबाला
नेपाल सरकार पर लालच और भ्रष्टाचार के तमाम आरोप लगते रहे हैं। लेकिन नेपाल सरकार पूरा दोष ट्रेकिंग कंपनियों पर मढ़ देती है। नेपाल के पर्यटन विभाग के महानिदेशक दंडुराज घिमिरे के अनुसार एवरेस्ट पर बड़ी संख्या में मौतों का कारण भीड़ नहीं है। वह कहते हैं कि सरकार परमिट की संख्या घटाएगी नहीं।

पर्वतारोहण की दुकानें
कुछ दशकों पूर्व एवरेस्ट पर सिर्फ प्रशिक्षित और अनुभवी पर्वतारोही जाते थे और इस काम में अच्छा खासा पैसा खर्च होता था। आज हालात विपरीत हैं। काठमांडू में छोटी-छोटी दुकानों से पर्वतारोही कंपनियां आपरेट कर रही हैं। सस्ते में एवरेस्ट ले जाने वाले इन आपरेटरों को सुरक्षा से कोई लेना देना नहीं होता। यही नहीं महंगी विदेशी कंपनियां भी सुरक्षा के साथ समझौता करती हैं। एवरेस्ट से सकुशल वापस आए अनुभवी पर्वतारोही रास्तों में होने वाले हादसों और मौतों के लिए ट्रेनिंग की कमी को जिम्मेदार मानते हैं। पर्वतारोही मानते हैं कि परमिट दिए जाने से पहले उम्मीदवारों की योग्यता की जांच होनी चाहिए।

अमीषा चौहान भी एक ऐसी ही पर्वतारोही हैं जो एवरेस्ट के रास्तों में मिले ‘ट्रैफिक जाम’ में फंसने के बाद सीधे अस्पताल पहुंच गईं। अमीषा फ्रॉस्टबाइट का शिकार हुईं। अमीषा कहती हैं कि बुनियादी प्रशिक्षण के बिना एवरेस्ट की चोटी पर जाने वालों को रोका जाना चाहिए। अमीषा ने बताया, ‘चढ़ाई के दौरान मुझे ऐसे कई पर्वतारोही मिले जिनके पास कोई प्रशिक्षण नहीं था और वे पूरी तरह अपने शेरपा गाइड पर निर्भर थे।’ उन्होंने बताया कि जिनके पास कोई ट्रेनिंग नहीं होती वे गलत निर्णय लेते हैं और अपने साथ-साथ शेरपा की जिंदगी को भी खतरे में डालते हैं। चढ़ाई के रास्ते पर मिलने वाली भीड़ को लेकर अमीषा बताती हैं, ‘मुझे नीचे आने के लिए 20 मिनट का इंतजार करना पड़ा, लेकिन वहां कई ऐसे लोग थे जो न जाने कितने घंटों से फंसे थे।’ उस भीड़ में लोग एकदम संवेदनहीन जैसा व्यवहार करते हैं। अमीषा मानती हैं कि प्रशासन को पर्वतारोहियों को एवरेस्ट पर जाने की इजाजत देने से पहले उनकी योग्यता जांचनी चाहिए। साथ ही सिर्फ प्रशिक्षित पर्वतारोहियों को ही जाने की इजाजत मिलनी चाहिए। कई बार पर्वतारोही स्वयं की लापरवाही के चलते जान गवां बैठते हैं। ऑक्सीजन खत्म होने के बावजूद वे चोटी पर पहुंचने की जिद करते हैं और अपनी जिंदगी को खतरे में डालते हैं।

लाशें और अराजकता
हाल में एक पर्वतारोही और ऐडवेंचर फिल्ममेकर एलिया साइक्ले ने इंस्टाग्राम पर डाली एक पोस्ट में कहा था कि एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचकर उन्होंने जो देखा उस पर उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। उन्होंने लिखा, ‘मौत, लाशें, अराजकता। रास्तों पर लाशें और कैंप में और चार लाशें। जिन लोगों को मैंने वापस भेजने की कोशिश की थी उनकी भी यहां आते-आते मौत हो गई। लोगों को घसीटा जा रहा है। लोग लाशों पर से गुजर रहे थे।’

आकर्षक बिजनेस
साल 1953 में एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे के पहली बार एवरेस्ट पर चढऩे के बाद से पर्वतारोहण एक आकर्षक व्यवसाय बन गया है। पर्वतारोहण के लिए नेपाल की ओर से जारी किए जाने वाले परमिट की कीमत करीब 11 हजार डॉलर है। ऐसे परमिटों के जरिए नेपाल के पास अच्छी खासी विदेशी मुद्रा आती है। एवरेस्ट पर चीन की तरफ से भी चढ़ाई की जाती है लेकिन उस तरफ से ज्यादा लोग नहीं जाते। इस साल तकरीबन 140 परमिट तिब्बत के उत्तरी छोर से जाने के लिए दिए गए थे। यह पता नहीं है कि 2019 में कितने लोगों ने उस तरफ से एवरेस्ट की चढ़ाई की।